ग्रंथवाल्मीकि रामायणयुद्धकाण्डसर्ग 3939.18वाल्मीकि रामायण 39.18शिखरम् तु त्रिकूटस्य प्रांशु च एकम् दिवि स्पृशम् । समन्तात् पुष्प संचन्नम् महा रजत सम्निभम् ।। ६-३९-१८।।पिछलाअगलापूरा अध्याय