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वाल्मीकि रामायण 38.5

येन धर्मो न विज्नातो न वृत्तम् न कुलम् तथा ।
राक्षस्या नीचया बुद्ध्या येन तद् गर्हितम् कृतम् ।। ६-३८-५।।

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