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वाल्मीकि रामायण 37.11

इन्द्रजित् पश्चिम द्वारम् राक्षसैर् बहुभिर् वृतः ।
पट्टस असि धनुष्मद्भिः शूल मुद्गर पाणिभिः ॥६-३७-११॥

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