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वाल्मीकि रामायण 29.5

किम्चिद् आविग्न हृदयो जात क्रोधः च रावणः ।
भर्त्सयाम् आस तौ वीरौ कथा अन्ते शुक सारणौ ॥६-२९-५॥

पूरा अध्याय