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वाल्मीकि रामायण 22.74

आगम्य गगने तस्थुर्द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ।
दशयोजनविस्तीर्णम् शतयोजन मायतम् ॥६-२२-७४॥

पूरा अध्याय