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वाल्मीकि रामायण 17.60

पृच्च्यमानो विशन्केत सहसा बुद्धिमान् वचः ।
तत्र मित्रम् प्रदुष्येत मिथ्य पृष्टम् सुख आगतम् ॥६-१७-६०॥

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