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वाल्मीकि रामायण 16.5

नित्यम् अन्योन्य सम्हृष्टा व्यसनेष्वाततायिनः ।
प्रच्चन्न हृदया घोरा ज्ञातयस् तु भय आवहाः ॥६-१६-५॥

पूरा अध्याय