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वाल्मीकि रामायण 16.27

निवार्यमाणस्य मया हित एषिणा ।
न रोचते ते वचनम् निशा चर ।परीत काला हि गत आयुषो नरा ।हितम् न गृह्णन्ति सुहृद्भिर् ईरितम् ॥६-१६-२७॥

पूरा अध्याय