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वाल्मीकि रामायण 122.33

अवाप्तं धर्मचरणं यशश्च विपुलं त्वया ।
रामं शुश्रूषता भक्त्या वैदेह्या सह सीतया ।। ६.१२२.३३ ।।

पूरा अध्याय