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वाल्मीकि रामायण 118.25

ततः प्रियार्हश्रवणा तदप्रियं प्रियादुपश्रुत्य चिरस्य मैथिली ।
मुमोच बाष्पं सुभृशं प्रवेपिता गजेन्द्रहस्ताभिहतेव सल्लकी ।। ६.११८.२५ ।।

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