ग्रंथवाल्मीकि रामायणयुद्धकाण्डसर्ग 113113.5वाल्मीकि रामायण 113.5ता बाष्पपरिपूर्णाक्ष्यो भर्तृशोकपराजिताः । करेण्व इव नर्दन्त्यो विनेदुर्हतयूथपाः ।। ६.११३.५ ।।पिछलाअगलापूरा अध्याय