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वाल्मीकि रामायण 108.5

शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवाम्बुदम् ।
तं दृष्ट्वा मेघसङ्काशमापतन्तं रथं रिपोः ।। ६.१०८.६ ।।

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