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वाल्मीकि रामायण 107.13

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ।। ६.१०७.१३ ।।

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