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वाल्मीकि रामायण 105.27

हरीणां चाश्मनिकरैः शरवर्षैश्च राघवात् ।
हन्यमानो दशग्रीवो विघूर्णहृदयो ऽभवत् ।। ६.१०५.२७ ।।

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