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वाल्मीकि रामायण 105.20

अद्य ते मच्छरैश्छिन्नं शिरो ज्वलितकुण्डलम् ।
क्रव्यादा व्यपकर्षन्तु विकीर्णं रणपांसुषु ।। ६.१०५.२० ।।

पूरा अध्याय