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वाल्मीकि रामायण 104.3

खगाश्च खरनिर्घोषा गगने परुषा घनाः ।
औत्पातिकानि नर्दन्तः समन्तात् परिचक्रमुः ।। ६.१०४.३ ।।

पूरा अध्याय