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वाल्मीकि रामायण 103.34

दशास्यो विंशतिभुजः प्रगृहीतशरासनः ।
अदृश्यत दशग्रीवो मैनाक इव पर्वतः ।। ६.१०३.३४ ।।

पूरा अध्याय