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वाल्मीकि रामायण 9.52

किन्किणी जाल सम्काशाः ता हेम विपुल अम्बुजाः ।
भाव ग्राहा यशः तीराः सुप्ता नद्य इव आबभुः ॥५-९-५२॥

पूरा अध्याय