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वाल्मीकि रामायण 9.20

तत्रस्थः स तदा गन्धम् पान भक्ष्य अन्न सम्भवम् ।
दिव्यम् सम्मूर्चितम् जिघ्रन् रूपवन्तम् इव अनिलम् ॥५-९-२०॥

पूरा अध्याय