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वाल्मीकि रामायण 68.2

एवं बहुविधं वाच्यो रामो दाशरथिस्त्वया ।
यथा मामाप्नुयाच्छीघ्रं हत्वा रावणमाहवे ।। ५.६८.२ ।।।।

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