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वाल्मीकि रामायण 65.18

एवं मया महाभागा दृष्टा जनकनन्दिनी ।
उग्रेण तपसा युक्ता त्वद्भक्त्या पुरुषर्षभ ।। ५.६५.१८ ।।।।

पूरा अध्याय