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वाल्मीकि रामायण 63.1

ततो मूर्ध्ना निपतितं वानरं वानरर्षभः ।
दृष्ट्वैवोद्विग्नहृदयो वाक्यमेतदुवाच ह ।। ५.६३.१ ।।।।

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