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वाल्मीकि रामायण 57.46

अहो स्वामिनि ते भक्तिरहो वीर्यमहो धृतिः ।
दिष्ट्या दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी ।। 5.57.46 ।।।।

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