ग्रंथवाल्मीकि रामायणसुन्दरकाण्डसर्ग 5757.31वाल्मीकि रामायण 57.31हर्षेणापूर्यमाणो ऽसौ रम्ये पर्वतनिर्झरे । छिन्नपक्ष इवाकाशात् पपात धरणीधरः ।। 5.57.31 ।।।।पिछलाअगलापूरा अध्याय