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वाल्मीकि रामायण 57.24

सर्वथा कृतकार्यो ऽसौ हनूमान्नात्र संशयः ।
न ह्यस्याकृतकार्यस्य नाद एवंविधो भवेत् ।। 5.57.24 ।।।।

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