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वाल्मीकि रामायण 55.21

तदहं भाग्यरहितो लुप्तधर्मार्थसंग्रहः ।
रोषदोषपरीतात्मा व्यक्तं लोकविनाशनः ।। 5.55.21 ।।।।

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