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वाल्मीकि रामायण 54.42

हुताशनज्वालसमावृता सा हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा ।
हनूमतः क्रोधबलाभिभूता बभूव शापोपहतेव लङ्का ।। 5.54.42 ।।।।

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