वाल्मीकि रामायण 53.45
स तान्निहत्वा रणचण्डविक्रमः समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् ।
प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली प्रकाशतादित्य इवार्चिमाली ।। 5.53.44।।
स तान्निहत्वा रणचण्डविक्रमः समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् ।
प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली प्रकाशतादित्य इवार्चिमाली ।। 5.53.44।।