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वाल्मीकि रामायण 53.42

स भूत्वा शैलसङ्काशः क्षणेन पुनरात्मवान् ।
ह्रस्वतां परमां प्राप्तो बन्धनान्यवशातयत् ।। 5.53.41।।।।

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