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वाल्मीकि रामायण 52.4

निश्चितार्थस्ततः साम्ना ऽ ऽपूज्य शत्रुजिदग्रजम् ।
उवाच हितमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः ।। ५.५२.४।।।।

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