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वाल्मीकि रामायण 48.57

हन्यतां दह्यतां वापि भक्ष्यतामिति चापरे ।
राक्षसास्तत्र संक्रुद्धाः परस्परमथाब्रुवन् ।। ५.४८.५७।।।।

पूरा अध्याय