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वाल्मीकि रामायण 48.46

स निश्चितार्थः परिवीरहन्ता समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेष्टः ।
परैः प्रसह्याभिगतैर्निगृह्य ननाद तैस्तैः परिभर्त्स्यमानः ।। ५.४८.४६।।।।

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