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वाल्मीकि रामायण 47.8

स तं समासाद्य हरिं हरीक्षणो युगान्तकालाग्निमिव प्रजाक्षये ।
अवस्थितं विस्मितजातसंभ्रमः समैक्षताक्षो बहुमानचक्षुषा ।। ५.४७.८।।।।

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