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वाल्मीकि रामायण 47.6

विराजमानं प्रतिपूर्णवस्तुना सहेमदाम्ना शशिसूर्यवर्चसा ।
दिवाकराभं रथमास्थितस्ततः स निर्जगामामरतुल्यविक्रमः ।। ५.४७.६।।।।

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