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वाल्मीकि रामायण 45.7

सृजन्तो बाणवृष्टिं ते रथगर्जितनिःस्वनाः ।
वृष्टिमन्त इवाम्भोदा विचेरुर्नैर्ऋताम्बुदाः ।। ५.४५.७।।।।

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