Utshovऐप डाउनलोड करें

वाल्मीकि रामायण 45.15

विनेदुर्विस्वरं नागा निपेतुर्भुवि वाजिनः ।
भग्ननीडध्वजच्छत्त्रैर्भूश्च कीर्णा ऽभवद्रथैः ।। ५.४५.१५।।।।

पूरा अध्याय