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वाल्मीकि रामायण 44.1

सन्दिष्टो राक्षसेन्द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली ।
जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्धरः ।। ५.४४.१।।।।

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