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वाल्मीकि रामायण 43.11

एमुक्त्वा विमानस्थश्चैत्यस्थान् हरियूथपः ।
ननाद भीमनिर्ह्रादो रक्षसां जनयन् भयम् ।।। ५.४३.१२।।।।

पूरा अध्याय