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वाल्मीकि रामायण 42.30

हनुमानपि तेजस्वी श्रीमान् पर्वतसन्निभिः ।
क्षितावाविध्य लांगूलं ननाद च महास्वनम् ।। ५.४२.३०।।।।

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