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वाल्मीकि रामायण 40.10

धारयिष्यामि मासं तु जीवितं शत्रुसूदन ।
मासादूर्ध्वं न जीविष्ये त्वया हीना नृपात्मज ।। ५.४०.१०।।।।

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