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वाल्मीकि रामायण 38.9

इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुबन्धुना ।
गुरुस्नेहेन भक्त्या च नान्यथैतदुदाहृतम् ।। ५.३८.९।।।।

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