ग्रंथवाल्मीकि रामायणसुन्दरकाण्डसर्ग 3838.56वाल्मीकि रामायण 38.56कौसल्या लोकभर्तारं सुषुवे यं मनस्विनी । तं ममार्थे सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय ।। ५.३८.५६।।।।पिछलाअगलापूरा अध्याय