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वाल्मीकि रामायण 37.27

मैथिली तु हरिश्रेष्ठात् श्रुत्वा वचनमद्भुतम् ।
हर्षविस्मितसर्वाङ्गी हनुमन्तमथाब्रवीत् ।। ५.३७.२८।।।।

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