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वाल्मीकि रामायण 3.4

सुपुष्ट बल सम्गुप्ताम् यथैव विटपावतीम् ।
चारु तोरण निर्यूहाम् पाण्डुर द्वार तोरणाम् ॥५-३-४॥

पूरा अध्याय