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वाल्मीकि रामायण 3.26

का त्वम् विरूपनयना पुरद्वारेऽवतिष्ठसि ।
किमर्थम् चापि माम् रुद्ध्वा निर्भर्त्सयसि दारुणा ॥५-३-२६॥

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