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वाल्मीकि रामायण 29.8

सा वीतशोका व्यपनीततन्द्री शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा ।
अशोभतार्या वदनेन शुक्ले शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ।। ५.२९.८।।

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