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वाल्मीकि रामायण 26.4

राक्षसीवशमापन्ना भर्त्स्यमाना सुदारुणम् ।
चिन्तयन्ती सुदुःखार्ता नाहं जीवितुमुत्सहे ।। ५.२६.४।।।।

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