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वाल्मीकि रामायण 18.8

ईहामृगैश्च विविधैर्जुष्टां डृष्टिमनोहरैः ।
वीथीः संप्रेक्षमाणश्च मणिकाञ्चनतोरणाः ।। ५-१८-८।।

पूरा अध्याय