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वाल्मीकि रामायण 15.34

स उपसर्गाम् यथा सिद्धिम् बुद्धिम् सकलुषाम् इव ।
अभूतेन अपवादेन कीर्तिम् निपतिताम् इव ॥५-१५-३४॥

पूरा अध्याय