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वाल्मीकि रामायण 15.12

अतिवृत्तम् इव अचिन्त्यम् दिव्यम् रम्यम् श्रिया वृतम् ।
द्वितीयम् इव च आकाशम् पुष्प ज्योतिर् गण आयुतम् ॥५-१५-१२॥

पूरा अध्याय